आपातकाल की सीख !

पच्चीस जून १९७५ की उमस भरी रात, देश का राजनीतिक तापमान शिखर पर था और बुनियादी सवालों पर देश ने निर्णायक ल़डाई का मन बना लिया था। युवाओं और छात्रों का स्वत:स्फफूर्त आंदोलन सत्तापरिवर्तन के आह्वान तक पहुंच गया था। एक जागे हुए देश को रात के स्याह अंधेरे में कारागार बनाने की चालें बुनी जा रही थीं, संविधान में संशोधन की शर्मनाक तैयारी हो रही थी, देशहित के नाम पर फफरेबी कसमें खाई जा रही थीं और भोर होतेहोते देश आपातकाल तले दमित हो गया था। रात के अंधेरे में ही प्रमुख विपक्षी नेता, छात्र संघर्ष समिति के नेता, अनेक पत्रकार, संपादक तथा सत्ताप्रतिष्ठान के आलोचक, सभी गिरफ्तार कर लिए गए। समाचार पत्रों पर सेंसरशिप लागू हो गई। २६ जून को अनेक अखबार छपे नहीं, कई छपे, तो बंटे नहीं, कई संपादकों ने संपादकीय पृष्ठ खाली छ़ोडे, तो कुछ ने संपादकीय पृष्ठ को काला कर दिया। पूरे देश में सत्ताप्रतिष्ठान का आतंक कायम हो गया, आमआदमी के मूलभूत मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए। इस काले दिन को ३३ वर्ष बीत गए है लेकिन आज भी १९७४७५ के मंजर आंखों के सामने तैर जाते हैं। तब देश को आजाद हुए २५ बरस से ज्यादा बीत गए थे। महंगाई, भ्रष्टाचार, कुशासन और बेरोजगारी जैसे मुद्‌दे चर्चा में थे। समूचे भारत में इन्हीं मुद्‌दों पर एक छात्र एवं युवा आंदोलन की सुगबुगाहट हो रही थी। सातआठ जनवरी १९७४ को दिल्ली में आहूत अखिल भारतीय छात्र नेता सम्मेलन और उसके बाद १७१८ फफरवरी को पटना में बिहार प्रदेश छात्र नेता सम्मेलन के नेपथ्य में गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन था। नवनिर्माण आंदोलन के दौरान पुलिस फफायरिंग में मारे गए लोगों के परिजन उस सम्मेलन में थे। ७ मई, १९७४ को चिमनभाई पटेल मंत्रिमंडल का त्याग पत्र और १५ मार्च, १९७४ को गुजरात विधानसभा का भंग किया जाना छात्रों को नई ताकत दे गया था। तब बिहार में नारा गूंजा, फङ्कगुजरात की जीत हमारी है, अब बिहार की बारी है।फङ्ख १८ मार्च, १९७४ को बिहार विधानसभा का घेराव करते लोगों पर पहले लाठीचार्ज और फिफर गोली चलाई गई। पटना में पुलिस की गोली से आठ लोग मारे गए, अगले दिन १९ मार्च को उस गोलीकांड के खिलाफफ पबिहार भर में जबरदस्त प्रदर्शन हुए। इस दिन कई जगह पुलिस और प्रदर्शनकारियों की झ़डपें हुईं। राज्य के पांच शहर कर्फ्यू की जद में आ गए। उसी शाम सरकार ने एक आदेश जारी करके बिहार के समस्त स्कूल व कॉलेज अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिए। कोई भी क्रांति किसी किताब की नकल नहीं करती, बल्कि हर क्रांति अपनी किताब खुद लिखा करती है। १२ जून, १९७५ को कांग्रेस गुजरात विधानसभा का चुनाव हारी और उसी दिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सोशलिस्ट राजनारायण की याचिका पर श्रीमती इंदिरा गांधी के चुनाव को भ्रष्टाचार के आधार पर अवैध घोषित करते हुए उनकी लोकसभा की सदस्यता रद्‌द कर दी।

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